जानें ससुराल में नई बहू क्यों महसूस करती है असहज, शुरूआत में

मोनिका अग्रवाल

25th November 2020

संयुक्त परिवार परंपरा ख़त्म होते जाने के बावजूद अभी भी घर में नववधू से ये आशा की जाती है कि वह एक पारम्परिक बहू और आदर्श बहू की तरह परिवार में शामिल हो,जितना संभव हो घर के सदस्यों की देखभाल करे .बड़े बुज़ुर्गों का सम्मान करे।

जानें ससुराल में नई बहू क्यों महसूस करती है असहज, शुरूआत में

हमारे भारतीय समाज में विवाह केवल पति पत्नी के बीच का विषय नहीं है.इसके दोनों के परिवार,रिश्तेदार और परिचितों के बीच भी एक नए रिश्ते की शुरुआत होती है और विवाह बंधन में बाँधने के बाद जिम्मदारियों केवल जीवन साथी के प्रति ही नहीं होतीं इसमें ,वो भी शामिल होते हैं जो किसी भी रूप में जीवनसाथी से जुड़े हैं.हमारा पारिवारिक ढाँचा अभी भी बहुत हद तक पारंपरिक है।

संयुक्त परिवार परंपरा ख़त्म होते जाने के बावजूद अभी भी घर में नववधू से ये आशा की जाती है कि वह एक पारम्परिक बहू और आदर्श बहू की तरह परिवार में शामिल हो,जितना संभव हो घर के सदस्यों की देखभाल करे .बड़े बुज़ुर्गों का सम्मान करे।

कुल मिलाकर पूरी तरह से ससुराल के रंग में रंग जाये.ऐसे में शादी के बाद बदले हुए माहौल में नव वधू अक्सर असहज महसूस करती है.दो माओं से बनते सुखद स्त्री जीवन की यह सबसे बड़ी विडंबना है कि लड़की का जन्म और परवरिश किसी और घर में हुई होती है व उसे ज़िंदगी किसी और घर में पूर्णतया नए माहौल में बितानी होती है.

सब कुछ तो बदल जाता है.खाने पीने का ढंग,पहनावा,बोलचाल,यहाँ तक उठने बैठने का तरीक़ा भी.हालाँकि समय के साथ साथ सबकुछ सही होता चला जाता है लेकिन तब तक घबराहट महसूस होना लाज़मी है।

किचन बन जाती है मजबूरी

एक महिला अपना अनुभव शेयर करते हुए बताती हैं,कि "शादी से पहले मैं काफ़ी अच्छा खाना बनाती थी लेकिन इस घर के खाने का तरीक़ा मेरे मायके से बिल्क़ुल अलग था.यहाँ टमाटर के मसाले में सब्ज़ी बनती थी,मेरे घर में सौन्फ के मसाले में सब्ज़ी बनती  थी.मेरे मायके में न आटे में नमक डालकर रोटी पकती थी न ही,चावल में नमक पड़ता था.चाय ज़्यादा दूध वाली पीते थे,यहाँ स्ट्रोंग चाय पीते थे .ससुराल में मैंने अपने तरीक़े से रोटी चावल पकाए तो हंगामा खड़ा हो गया.शुरू शुरू में इतनी नर्वसनेस होती थी की क्या बताऊँ"

बहुत सी जिम्मेदारियां आ जाना-

एक लड़की जो अपने मायके में मनमर्ज़ी से सूरज उगने तक सोती रहती है,रात बिरात टीवी पर मूवी देखती है,फ़ोन पर देर तक गपशप करती है,विवाह होते ही उससे कर्तव्यपूर्ति की उम्मीद की जाती है.सुबह उठते ही उससे नहाकर सबको बेड टी से लेकर,नाश्ता और डिनर बनाने तक की अपेक्षा की जा सकती है.कुछ परिवारों में तो बहू के प्रथम भोज पर लम्बीचौड़ी दावत का भी आयोजन होता है.हालाँकि समझदार माएँ अपनी बेटियों को शुरू से ही इन सब बातों के लिए शादी के पहले से ही शिक्षित करती रहती हैं.समस्या,हॉस्टल में पलने वाली लड़कियों के लिए विकट हो सकती है,और उन्हें ऐडजस्टमेंट में भी समय लग सकता है.

सबका मान सबका सम्मान

मायके में वो चाहे किसी से बेहद अदब से बात न करती हो,या चरणस्पर्श करके आशीर्वाद न लेती हो लेकिन ससुराल में उससे उम्मीद की जाती है कि जब भी उससे कोई मिलने आए वो उनके चरणस्पर्श करके उनका आशीर्वाद ले.ख़ुद खाने से पहले बुज़ुर्गों को खिलाए.अगर उनकी स्टिक न मिल रही हो तो ढूँढ कर ला दे.आज भी कहीं कहीं बहुओं से सर पर पल्ला रखने की प्रथा प्रचलित है.

मन की बात मन में रखना

ऊँचे स्वर में बात करना,हँसी ठिठोली करना,हाथ मटका मटका कर बात करना,ताल ठोकना,ये सब ऐसी बातें हैं जो ,आज भी नयी बहू के लिए मान्य नहीं हैं.यहाँ तक कि कुछ परिवारों में तो नयी बहू अपने मन की बात भी खुल कर नहीं कह सकती.शलिनी के साथ ऐसा ही हुआ.उसे ब्रेकफ़ास्ट करने की आदत नहीं थी जबकि ससुराल में ठीक आठ बजे सब डाइनिंग टेबल पर बैठ कर भारी नाश्ता करते थे.एक दो दिन तो बेचारी होंठ सीए रही,जब पेट में गड़बड़ महसूस होने लगी तो उसने अपनी समस्या पति से डिसकस की.पति ने माँ को समझाया.आख़िर मामला दूध कॉर्नफ़्लेक्स से सुलझा।

पिता की लाड़ली -

बेटियाँ अक्सर पिता की लाड़ली होती हैं,और उन्हें अपनी बेटी के साथ ज़रा सी टोका टाकी पसंद नहीं आती.अपने झूठे बर्तन टेबल से न उठाना,अंडर गारमेंट्स न धोना,हो हो करके हँसना,फ़ोन पर ज़ोर ज़ोर से बात करना,कुछ ऐसी आदतें हैं जो नयी बहू के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं.एक वक़ील पिता तो यहाँ तक कहते थे कि,"ससुराल में किसी ने उनकी बेटी को ऊँगली भी दिखाई तो अपनी बेटी को तलाक़ दिलवा दूँगा."बेटी जब तब ससुराल से आकर पिता से शिकायत करती,"वहाँ सब लोग मुझसे लड़ते हैं यहाँ तक कि चौखट भी मुझ से लड़ती है"माँ समझदार थी.उन्होने बेटी को समझौते और सामंजस्य स्थापित करने का ऐसा पाठ पढ़ाया कि समय थोड़ा ज़रूर लगा लेकिन बेटी का घर बस गया

अनकंफर्टेबल सिचुएशन -

ये सिचुएशन कभी भी किसी के साथ भी हो सकती हैं लेकिन अगर आप नई नवेली दुल्हन हैं और ऐसी कोई सिचुएशन जैसे कि डीनर करते हुए डकार आ जाना, या फिर सब लोग बैठे हो और आपको गैस पास करनी हो, ऐसी स्थिति आपको थोड़ा असहज फील करवा सकती है।

दूधों नहाओ पूतों फलों

दूधों नहाओ पूतों फलों का आशीर्वाद नव वधू को पहले दिन से ही मिलने लगता है.आपको पसंद आए न आए ,सुनना पड़ेगा.ऐसे मज़ाक़ बड़ी बूढ़ी औरतों  और यार दोस्तों के बीच चलते ही रहते हैं असहजता का दामन त्याग कर सहज बने रहने में ही भलाई है

अगर नववधू अपना आत्मसम्मान व आत्मविश्वास बनाकर रखते हुए नए परिवार के साथ ख़ुद को आत्मसात करे तो,अपनत्व व स्नेह के बंधन से अपने पति को ही नहीं,पूरे परिवार को बाँध सकती है.ज़रूरत है ,शालीनता का दामन थामते हुए,नए माहौल में,इस तरह घुलमिल जाने की  जैसे, दूध में शक्कर घुलकर नई मिठास को जन्म देता है.व परिवार के हरसदस्य को मान सम्मान दे तो अनायास ही सबकी चाहेती बन सकती है

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