आत्म-केन्द्रित सास - प्रोजेक्ट सास

मोनिका अग्रवाल

7th April 2021

कई बार सास के बर्ताव को देखते हुए बहु पाती है कि सास सिर्फ सास होती है वह अच्छी बुरी तो हो सकती है पर वह मां नहीं हो सकती। इस सोच तस्दीक ऐसी सासों द्वारा कर दी जाती है जो बहू को नीचा दिखाने का मौका तलाशती है।

आत्म-केन्द्रित सास - प्रोजेक्ट सास

मां-बेटी...सास-बहू का सीरीयल देख रही होती हैं...बेटी सीमा अपनी मां से कहती है..मां क्या हर सास का शगल होती है घर में राजनीति ऐसी ही होती है...बहू को हमेशा परेशान करने वाली..मां सीमा से कहती है नहीं...ये बहू के ऊपर होता है...वो अपनी सास को कितना खुश रख पाती है...बेटी सीमा कहती है...मां क्या मेरी सास भी ऐसी ही होगी...मां बताती है..नहीं सीमा हर सास एक जैसी नहीं होती है...कुछ कुछ बहू में शैतान आ जाती है घर में..जो लड़ाकू होती हैं...सीमा की भी कुछ दिनों में शादी हो जाती है...बहुत सारी उम्मीदों के साथ सीमा अपने ससुराल जाती है...पहले दिन तो सीमा को अपने ससुराल में अच्छा नहीं लगा...उसने अपनी मां से बात की...मां ने समझाया..बेटी अभी कुछ दिनों में अच्छा लगने लगेगा..फिलहाल बेटी ने फोन कटा ही था की...तुरंत सास आ गई...क्या हुआ सीमा…उदास क्यों हो...मैं भी तुम्हारी मां जैसी हूं...सीमा ने कहा...जी मां...अगले दिन सीमा देर से उठी...सास कमरे में आई..उठो सीमा...इतनी देर तक नहीं सोना चाहिए..उठो और चाय बनाओ जाकर..सीमा जी माजी...चाय़ देकर सीमा अपने कमरे में आई और अपनी मां को फोन लगाया...और पूरी कहानी बताई...सास सीमा को आवाज देते हुए...सीमा ओ सीमा...इधर आओ..जल्दी से...सीमा- आई माजी...मां का फोन काटते हुए जा रही हूं..बुला रही हैं..सास के पास सीमा पहुंची..जी माजी..सास ने सीमा से कहा...कहां घुसी रहती हो कमरे में...घर के कुछ काम वाम कर लिया करो...हमेशा बंद कमरे में घुसी रहती हो...बताइए मां...क्या काम है...जाओ खाने पीने की तैयारी करो..दोपहर हो गई...सीमा खाना बना चुकी थी...सास ने खाना खाया..और नमक ज्यादा बताकर सीमा पर तंज कसने लगी...क्या बहू खाना बनाना नहीं आता है अभी तक...क्या घर पर खाना नहीं बनाती थी...सीमा नाराज होते हुए अपने कमरे में आ गई..सास का इमोशनल ड्रामा करने लगती हैं.और मां को फोन पर बताया की...मां सास अब तो हर छोटी सी छोटी से बात पर नाराज हो जाती है...और गुस्सा करने लगती हैं..मां ने सीमा समझाया...देखो बेटी..ज्यादातर सास ऐसी ही होती है....जो हमेशा मौका देखती हैं और बहू को एहसास दिलाती है...की सास सास होती है

बेटी जब बहु बनती है तब उसे सीख दी जाती है कि ससुराल में तुम्हें एक और मां मिलेगी। और नई नवेली दुल्हन तमाम सीखों का पिटारा लिए ढेर सारी उम्मीदों के साथ नए घर में पहुंचती है। पर अक्सर हकीकत इन बातों से कुछ इतर होती है। कई बार सास के बर्ताव को देखते हुए बहु पाती है कि सास सिर्फ सास होती है वह अच्छी बुरी तो हो सकती है पर वह मां नहीं हो सकती। इस सोच तस्दीक ऐसी सासों द्वारा कर दी जाती है जो बहू को नीचा दिखाने का मौका तलाशती है। इनका रिश्ता बहू के साथ बिल्कुल दफ्तर के उन सहकर्मियों की तरह ही समझिए जोकि लेग पुलिंग का मौका नहीं छोडऩा चाहतीं। 

सभी मामलों में यही राय बनें जरूरी नहीं पर कई मामलों में ऐसा होता है कि सास का व्यवहार बिन मौसम बारिश की तरह नजर आता है। जिसमें पल में धूप और पल में बूंदे होती हैं। ऐसे में बहू भ्रमित रहती है कि ससुराल में मौजूद वह औरत कब उसकी मां है और कब सास। ऐसे में सास बहू को नीचा दिखाने का एक मौका भी नहीं छोड़ती। ध्यान रखिए कि दो निगाहें आप पर हमेशा हैं जो आपके उठने-बैठने, खाने-पीने सरीखी तममा गतिविधियों पर पैनी निगाह रखे हुए है और कमी मिलते ही आपको कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा। कई मामलों में जिंदगी के लगभग हर मोड़ पर जाने-अनजाने सास यह अहसास करा ही जाती है कि वह बहू के पति की मां है उसकी नहीं। लिहाजा, बहू के हिस्से जो आता है वह सिर्फ और सिर्फ उम्मीद। यानी बहू घर में सिर्फ दूसरों की उम्मीदों को पूरा करने के लिए होती है। वह दूसरों से खुद के लिए थोड़ी भी उम्मीद न करें। 

उपाय हैं यह 

सास का बर्ताव पल में शोला, पल में माशा की तर्ज पर चलता है। मुमकिन है कि सास एकदम से आपके साथ बेहद अच्छा व्यवहार करने लगें ऐसे में जरूरी है कि आप सजग रहें। यदि आप सजग नहीं रहती तो मुमकिन है कि वह आपकी कमियों, बातों को आपके खिलाफ हथियार की तरह प्रयोग कर दें। बेहतर होगा कि आप मानकर चलिए कि कभी भी सास मिजाज बदल सकता है।  सास आपको घर के बाकी सदस्यों की तरह अपनाएगी इसकी सम्भावना भी कम है। लिहाजा, उम्मीदों का बोझ मत पालिए। और सिर्फ और सिर्फ अपने कर्तव्यों को निवर्हन करती रहिए। अपनी गतिविधियों में घर के बाकि सदस्यों को भी शामिल कीजिए ताकि कमियों का ठिकरा सिर्फ और सिर्फ आपके सिर पर न फूटने पाए।

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